बच्चों को देख, बच्ची हो जाती हूं।उनके प्यार से, अपने बचपन को छू लेती हूं।मेरी मां , जब भी मुझे पुचकारती है, आज भी उनकी गोदी में इतर के सो जाती हूं।पापा की हंसी देख, अपने सारे दर्द भूल जाती हूं।बच्चों को देख बच्ची हो जाती हूं ।ससुराल आते ही, छोटी होकर भी बड़ी कहलाती हूं।अब बचपना भूल बड़ी होकर , जिम्मेदारी निभाती हूं।सबका ध्यान रखना जरूरी,लेकिन अपनी शौख भी जिंदा रखना चाहती हूं।मैं आज भी बच्चों को देख, बच्ची बन जाती हूं।

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