मेरी कविताएं

सुनो मेरी स्वरचित कविता की कहानी।
मेरी ही जुबानी।
पुरानी सारी कविताएं मेरी, बहुत अच्छी लगती है मुझे
जितनी बार भी पढ़ू, पुरानी सखी सा एहसास दिलाती है, वो मुझे।
और भी गहरा हो रहा है, अब कॉपी कलम से रिश्ता मेरा।
मन में आया हर भाव, जब कविता बनकर निखर जाता है मेरा।
जब भी पढ़ती हूं, हृदय में एक हलचल सी हो जाती है ,अपने ही भाव को पढ़कर।
और खो जाती हूं अपनी कविताओं में ,
स्वयं कविता बनकर।
निखारती रहती हूं, मैं हर एक शब्द रूपी गहनों को बार-बार।
फिर टटोलती भी हूं  हर बार, कहीं कोई छूट ना जाए मुझसे उसके शब्दों का श्रृंगार ।
कभी कविता मिलन के भाव को दर्शाती,
तो कभी प्रिय की प्रेयसी बन है तड़पाती ।
कभी चीर हृदय बंदूक की गोली  बन जाती।
तो कभी रंगीन रंगों की रंगोली जीवन में है खिल जाती,
कभी सावन की हरियाली बन ,मन  आंगन में झूला   झूलती ।
तो कभी जीवन में पतझड़ की झड़ी है लगाती।
जब जब कविता मेरी, मुझसे है बन जाती ।
यूं लगता है उस वक्त मुझे
जैसे सावन की हरियाली, होली के रंग  और दिवाली की रोशनी सब एक साथ  हैं मुझको मिल जाती।
और एक अमिट सी छाप मेरे मन मंदिर में फिर से है जोड़ जाती।
तभी तो कविताएं मेरे एहसासों की पुरानी सखी है कहलाती ,
मुझे मेरी कविताएं बहुत सुहाती ,
मुझे मेरी कविताऐं बहुत  है भाती।

मनीषा मारू (नेपाल)