मैं जैसी हूं मुझे वैसी ही रहने दो।

मैं जैसी हूं, मुझे वैसी ही रहने दो।

सब में खामियां और कमियां होती है,

फिर क्यों सिर्फ मेरी ही खामियां परखी जाती है,

तुझ में भी बहुत सी खामियां तो होगी ही निसंदेह।

गढा तुझे जिस ईश्वर ने,

उसने ही मेरी रचना भी की है।

ठोकर खाकर हर इंसान संभल जाते हैं,

मैं भी संभल जाऊंगी।

लेकिन अपने आप को बदलने का हक,

किसी को भी ना दे पाऊंगी।

मेरी जिंदगी मेरी है,

मेरे सपने भी मेरे ही होंगे।

हर कठिन राह तय करके भी,

अपने सपनों को जरूर पूरा कर जाऊंगी।

कठिनाइयां तो धूप छांव की तरह है,

अती और चली जाती है।

इरादा अगर मजबूत हो,

तो हार भी जीत में बदल जाती है।

यह वादा किया है खुद से,

अपने लक्ष्य तक एक दिन जरूर पहुंच ही जाऊंगी,

चाहे जितनी अर्चने पैदा कर दो।

मैं ना कभी घबराउगी।

मैं जैसी हूं मुझे वैसे ही रहने दो।

मनीषा मारू