वो बचपन प्यारा, हर खेल था जिसमें निराला।
खेल खेल में मस्त रहते, घर हो या पाठशाला।
हार जीत का गम नहीं,होता कोई किसीसे काम नहीं।
तरह तरह के खेल खेलते,एक खेल से मन भरता नहीं।
कभी पतंग ले भाइयों के पीछे दौड़ी,
तो कभी देखती,कैसे बंधाते हैं लट्टू में वो डोरी।
कभी मिलकर खेलते सभी रुमाल चोर,
और फिर भगा भगा के करते खूब शोर।
खोद के मिट्टी,लगाकर गिल्ली ,मार के डंडा,
कोन कितना दूर उछलता,दिखाते सब अपना फंडा।
छोटे भाई बहनों का खाने में वो नखरा दिखाना,
ये दादा का.. ये दादी का… ये मम्मी का…ये पापा का..
खेल खेल में सबका नाम ले फिर उनको खाना खिलाना।
बरसात के पानी में वो कागज की नाव चलाना,
कपड़ो के गुड्डे ,गुड़िया बनाकर उनका ब्याह रचना।
खुली छत पे सबका इक्ठे ही सो जाना,
नीद न आने पर,शरारत का खेल खेलना
यहां भूत हैं डराकर फिर सबको नीचे ले जाना।
कहां भूला पाएंगे वो सारे खेल,
वो बचपन का जमाना।
छुपन छुपाई का अलग ही था नजराना,
सांप सीढ़ी के खेल में
सांप के कटते ही नीचे आजाना,
और फिर से सीढ़ी चढ़ ऊपर बढ़ जाना।
इस बात का जहन में एकदम से बैठ जाना
खेल कोई भी हो जीवन का,
हमे तो बस उसको खेलते जाना।
अब जिंदगी को हैं ये बतलाना,
बचपन में इतने खेल खेले हैं… ऐ_ जिंदगी,
अब तेरे हर खेल में, हमें तो हैं बस मुस्कुराना…
अब तेरे हर खेल में, हमें तो हैं बस मुस्कुराना।
©®मनीषा मारू
नेपाल