#Imagination#life

हमारे जीवन का सुंदर सूर्योदय तभी होता हैं।
जब हम हर कदम हार कर भी,
फिर से उम्मीदों की नई किरणों के साथ,
हौसलों को बुलंद कर,
जीवन की नई शुरुआत कर लेते हैं।जब हम टूट कर हार जाते हैं
निराशावादी बनकर….
उस वक्त केवल धुंध का वातावरण ही
हमें चारों ओर नजर आता है।

लेकिन जब हम टूट कर हार जाते हैं
निराशावादी बनकर….
उस वक्त केवल धुंध का वातावरण ही
हमें चारों ओर नजर आता है।

फिर हमें न ताजे खिले गुलाबो की सुगंध
अच्छी लगती हैं।
ना ही हमारे स्वाद पर ताजी पीसी हुई कॉफी
का ही कुछ असर होता है।

©®मनीषा मारू
           नेपाल

#Moneyplant

गमले और बोतलों में लगा
   मनीप्लांट का पौधा मुझे भीतर
   ही भीतर कचोट रहा।
 
  जब भी बेल बढ़ती मेरी
  हर कोई चोरी छिपे उसे तोड़ रहा।

  जाने कैसी शत्रुता है सबकी मुझसे
  मैं आज तक समझ ना पाई,
  बस उलझनों के धागों सा
  चारों ओर मन मेरा हे टूट कर बिखर रहा।

   पहले मुझे मेरे अस्तित्व से हे मिटाते,
   फिर मेरे वजूद को कभी गमले में,
   तो कभी बोतलों में लगा
   हर कोई अपना घर हे सजा रहा।

  मेरी बेल की हर एक गांठ से
  रिसता हुआ दर्द का आंसू ,
  अपने रूदन से मेरे अंतर्मन को
  अब तो तड़पा के भिगो रहा।

©®मनीषा मारू
           नेपाल

आसमान

आज बैठी छत की मुंडेर पर,
देखा आसमा की ओर,
जनता है वह अपनी विशालता,
फिर भी जाने क्यों ?
बूंद बूंद अपने जज्बातों को.. छलका रहा मेरी ओर।

जब पूछा मैंने …
उसके छलकते हुए आंसुओं का राज,
तो वो बैचेन हो, व्याकुलता से जैसे मुझे बता रहा हो,
सब छू लेना चाहते हैं मुझको,
लेकिन रिक्तता को मेरी,
कोई नहीं इस जगत में समझ पा रहा!

मैं आसमा होकर भी… सदा धरा से वंचित रहा,
कभी बूंद बूंद ,कभी रिमझिम रिमझिम कर,
तो कभी घनघोर बरस कर…
अपने खालीपन के हर गमों को
वसुंधरा से बस यूं ही बता रहा।

कोई ना हैं यहां पूर्ण
बस यही बात बेजुबा होकर भी,
मैं सबको इशारे से समझा रहा..
मैं सबको इशारे से समझा रहा।

©®मनीषा मारू
           नेपाल

ना तलवार की धार से, ना गोलियों की बौछार से.. बंदा डरता है तो सिर्फ परवर दिगार से.

#फिल्म #तिरंगा ब्रिगेडियर सूर्यदेव सिंह,(1992)

इंसान हूं, फिर इंसानों से कैसा डरना?
नेकी की राह हे अगर पकड़ी
तो पड़ेगा अकेले ही चलना।

ना हालातों से डरना ना,अंधेरों से घबराना।
उम्मीदों से टूट कर भी,
नित्य नई आशा की ज्योत है जलाना।
फिर हर डगर महसूस होते दिखेगा तुझे,
संग तेरे खुदा का मुस्कुराना।

फक्र होता हे देख सदा,तिरंगे का लहराना
चाहें हो वो एक देश सिपाही
या हो एकदेश प्रेम दीवाना।
आन बान और शान पे इसकी
बस आता हे उसको तो निडर होकर मर मिटजाना।

जितनी सांसे उतना ही है सबका जीना,
सच्चे कर्म पर हो अगर विश्वास अटल
तो नही पड़ेगा किसी के आगे गिरना
झुकना पड़े तो बंदे
बस एक खुदा के आगे ही तुम झुकना।

और डरना पड़े तो ना तलवार की धार से, ना गोलियों की बौछार से.. डरना सिर्फ अपने परवर दिगार से।

©®मनीषा मारू
           नेपाल

#विश्वास

विश्वास सबसे महंगी दवाई,
जो यूं ही नहीं जाती है लोगों को पिलाई।
बरसो लग जाते हैं जिसको बनाने में,
पल भर में ही हो जाती है इसकी date expiry

लेकिन विश्वास की यह दवाई,
जब खुद पर जाती हो आजमाई,
तो सबसे बड़ी ताकत बन निखर जाए,

इरादा मजबूत और हौसला बुलंद हो जाए ,
लगन और मेहनत की आस्था
फिर तो अपने आप ही बढ़ जाए,

भरोसा हो खुद पे अगर तो
तो छोटी छोटी आशा की किरणें भी
बड़े से नभ के अनंत छोर को छू जाए,
आखरी हरी हुई जंग भी,जीत में बदल जाए,

अपने नेक इरादों और कर्मों पर,
इंसानों का विश्वास अगर टिका रह जाए,
तो जहर भी अमृत बन जाए,
और सबका जीवन एक सफलता की कुंजी बन जाए।

©®मनीषा मारू
नेपाल

#राशि

सिंह राशि से जुड़ा हे मनीषा मारू का नाम,
हौसला बुलंद सदा रखती करने को हर काम।

जीत हार की कभी फिक्र ना करती ,
मौका जो मिल जाए मुझको एकबार,
अपनी प्रतिभा दिखने को रहती हरदम मैं तैयार।

प्रतिभा दिखना ही मैं अपनी ,सबसे बड़ी जीत समझती हु,
निर्णायक के नृण्य की मैं प्रतीक्षा कम ही करती हु।

विपरीत परिस्थितियों की चुनौती मैं हु स्वीकारती।
सिंह की तरह नहीं दहाड़ती ,
लेकिन अपने आत्मसम्मान के खिलाफ गर्जन जरूर हु करती।

जन्म जो मिला,कर्म अपने ही संग जाते हैं
अपने हिस्से की लड़ाई सबको लड़नी होती है
राशियों में ज्यादा कुछ ना रखा,
राशि तो राम और रावण की भी एक ही होती हैं।

©®मनीषा मारू
नेपाल

#दोस्ती#strong

अपने जैसा तुम मुझे भी strong बना दो,
बस इतनी सी दोस्ती कि रश्म निभा दो।
कर्जदार हो जाऊंगी तुम्हारी, ताउम्र के लिए,
जो लिखा था तुमने कागज के चन्द पन्नों पे मेरे लिए,
बस उन अल्फाजों को मेरे दिल से मिटा दो।
तुम्हारे लिए महज एक इत्तेफाक होगा,
तुम्हारा मेरा मिलना और उन कागज पर
अपनी लेखनी को उकेरना।
लेकिन मेरे लिए वह इत्तेफाक एहसास बन गया
और गुजरते वक्त के साथ पल पल नामी दे गया।
मेरे उन एहसासों के जज्बातों को
ना कोशिश की ना समझा होगा!
तुम्हें फर्क ही क्या पड़ता होगा,
चाहें कोई मायूस हरपल तुम्हारी खामोशी से रहता होगा।
सारी गलती तो मेरी ही होगी
और मुझपे ही तुम थोपोगे,
लेकिन इतना जनलो  उन गलतियों की वजह
भी तो सिर्फ तुम और तुम ही तो होते होगे।
दो तरफा रिश्ता जब एक तरफा  हो जाता है।
तो सदेव उस रिश्ते को अनदेखा कर
नैनो से छला जाता है।
एक और अपने आप को जो strong दिखलाता है।
ओर उसकी मुजबूती अभी भी बरकार है, यह बतलाता हैं
लेकिन दूजी ओर दूसरों के एहसासों को
बड़ी सख्ती से हरबार तोड़ ….जो खुद को मैं strong हु ये दिखता होगा, वो खुद भी कई बार जख्मी तो हो जाता होगा।

©®मनीषा मारू
नेपाल

अवसर

एक अवसर मिला की अवसर पर कुछ लिख जाऊं
कुछ शब्दों में ही सब कुछ कह जाऊं,

खुद भी मुस्कुराह लू और जो बैठे है
भर के नैनो में गमों की नमी उनको भी यहीं समझाजाऊं।

चार दिनों की जो मिली हैं जो जिंदगी
विपरीत परिस्थितियों में भी इसें स्वीकार करती जाऊं।

हर बार दामन में खुशियों की सौगातें मिलें ये जरूरी नहीं,
कांटों के बीच खुद को गुलाब सा खिलाऊं,
और ओरो को भी इसी चुभन के साथ
खिलने को तत्पर करजाऊं।

सुख दुःख का समावेश होती है जिंदगी,
ना सुख में इतराऊं ना दुःख में घबराऊं,
बस जिंदगी के हर लम्हें को जिंदादिली से जीती चली जाऊं।
खुद को यही समझाऊं ओरो को भी यही बतलाती जाऊं।

©®मनीषा मारू
नेपाल

आदर्शलोक

स्वर्ग यहां नर्क यहां
क्या देखा है ?
किसी ने आंखों से सारा जहां।
फिर फर्क करना कैसे  सबको आ गया!

सोचते सभी स्वर्ग के द्वार जाने को,
लेकिन स्वार्थी जीव वंचित ना रह पाता,
छलनी करने से किसी की आत्मा को।

जब ला दो किसी के,
उजड़ी उम्मीदों की आंखों में खुशियों की नमी।

जब दे दो तुम बहाकर अविरल धारा सी ,
सींच प्रकृति को नेह प्रेम कि बलि।

और तृप्त करदों किसी के बिलबिलाते
भूखे पेट की अंतरआत्मा को,

तो समझ लेना आदर्शलोक का स्वर्ग
इस धरा पर भी पलता है ,
किसी न किसी इंसानों के बीच यही  कहीं।

©®मनीषा मारू
          नेपाल

सवाल

तुमसे थी एक छोटी सी आशा।
बात करने की ही तो थी बात।
फिर क्यों खामोशी से,
कर दिया तुमने, मुझको नजरअंदाज।

बिना बात किए ,
तुम सही और मैं गलत कैसे हो गई।
बस इतना ही बता दो,
मेरी किस बात से तुझको नफरत सी हो गई।

मेरे इस सवाल का
क्यों तुम्हारे पास कोई जवाब नहीं?
इंसान ही तो हूं ,
जो गलती अगर मुझसे कोई हो गई।

विश्वास करना तो तुमने छोड़ा,
फिर कैसे तुम बेगुनाह
और मैं तुम्हारे लिए गुनहगार हो गई?

मेरे किसी भी सवालों का
क्यों लगता तुमको
जवाब देना जरूरी नहीं?
तुमसे कभी तुमको मैने मांगा भी तो नही।
पसंद ही तो करती थी तुम्हें,
बुरा तो मैने कभी तुम्हारा चाह भी नहीं ।

मगर यह मत सोचना यार मेरे
तेरी खामोशी से होता मुझको दर्द नहीं है..
तेरी खामोशी से होता मुझको दर्द नही।

मनीषा मारू
नेपाल