सवाल

तुमसे थी एक छोटी सी आशा।
बात करने की ही तो थी बात।
फिर क्यों खामोशी से,
कर दिया तुमने, मुझको नजरअंदाज।

बिना बात किए ,
तुम सही और मैं गलत कैसे हो गई।
बस इतना ही बता दो,
मेरी किस बात से तुझको नफरत सी हो गई।

मेरे इस सवाल का
क्यों तुम्हारे पास कोई जवाब नहीं?
इंसान ही तो हूं ,
जो गलती अगर मुझसे कोई हो गई।

विश्वास करना तो तुमने छोड़ा,
फिर कैसे तुम बेगुनाह
और मैं तुम्हारे लिए गुनहगार हो गई?

मेरे किसी भी सवालों का
क्यों लगता तुमको
जवाब देना जरूरी नहीं?
तुमसे कभी तुमको मैने मांगा भी तो नही।
पसंद ही तो करती थी तुम्हें,
बुरा तो मैने कभी तुम्हारा चाह भी नहीं ।

मगर यह मत सोचना यार मेरे
तेरी खामोशी से होता मुझको दर्द नहीं है..
तेरी खामोशी से होता मुझको दर्द नही।

मनीषा मारू
नेपाल