“समाज री बुराइयां व निवारण रा उपाय” मेरी एक छोटी सी लेखनी माय।

“आपा बेशक समाज रो हिस्सों हा,
लेकिन समाज तो आपा सु  ही है।
अगर बुराइयां विनाश रो रूप ले रही है,
तो निवारण भी आपन हाथ में ही है।”

समाज जी तेज रफ्तार सु परिवर्तनशील हो रियों हैं, दिन प्रतिदिन समस्या विकराल रूप धारण कर रही  हैं। लगातार बढ़ती जनसंख्या, महंगाई, गरीबी  र कारण भुखमरी समाज में जहर जिया फैल रही है।
आए दिन तलाक, लुप्त होवता आपना संस्कृति और संस्कार,ब्याव सु पहला मिलनो- जुलनो,इंटरनेट को गलत इस्तेमाल करनों,एकल परिवार,बाल श्रम,
नशाखोरी ,दहेज प्रथा, भ्रूण हत्या, पश्चिमी सभ्यता सु बदलतो खान -पान ,रहन -सहन इतनो ही नहीं
दिखावा र लार मच रही होड़ा – होड़ी  सु छोटो
स छोटा कार्यक्रम न भी बड़ों और भव्य आयोजन रो रूप दे दियो जाव है ।
सबसे पहला तो आपा न अपनों ही विचार बदलनो परसी जद ही आपा समाज, राष्ट्र और देश न बदल नुवो रूप दे सका हैं। बचपन सु ही आपा बेटा न संस्कार रो ज्ञान देवा और नारी रो घर म ही नहीं बारा भी सम्मान करना सिखावा। बेटियां न भी संस्कार र साथा आत्मरक्षा और आत्मसम्मान रो ज्ञान दें शिक्षित करावा।
जाति और धर्म की आड़ में भी समाज रो बटवारो होरीयो हैं । बिन भी आपसी भाईचारा और प्यार सु हटावा और समाज न सुदृढ़ बनावा। रूढ़िवादिता और अंधविश्वास के कारण समाज आगे बढ़कर भी पिछरेड़ों हैं। इके लिए समय-समय पर जगह-जगह जागरूकता को प्रचार प्रसार करवनों जरूरी है ताकि समाज र हर एक व्यक्ति मानसिक रूप स कुरीतियां र खिलाफ होर जागरूक बनजाव।
आज की युवा पीढ़ी के लिए , सबसे ज्यादा जरूरी है नशा मुक्ति अभियान शुरू कर जागरूक करावानों ।जद ही समाजिक और आर्थिक दोनों ही क्षेत्र में आपा विकसित हो सक है ।
नारी उत्थान र खातिर भी जगह-जगह  शिक्षा व्यवस्था कराई जाव ताकि भविष्य में कर्तव्य और अधिकार न समझ नारी स्वयं सही निर्णय ले सकें। एक “नर” अगर शिक्षित हुव तो स्वयं ही विकसित हुव हैं। लेकिन एक “नारी “अगर  शिक्षित  हुव तो सरो कुटुंब ,परिवार, समाज, राष्ट्र ही नहीं  देश भी विकसित हुव हैं।
एक छोटो स उदाहरण-   “आपा कदाई कोनी चावा आपना टाबर आपर घर माही चोरी करें या अपना नौकर धोखा देवें और घर परिवार के सदस्य गैर जिम्मेवार हुव ,चौकीदार पेहरो देना री जगह सोजावा, सब्जी वालों कम सब्जी तोल।जद आपा छोटी-छोटी बातों रो ध्यान रख सबसु इमानदारी चावा तो फेरू समाज किया बिना इमानदारी सु आगे बढ़ सक है।
समाज न आपा सु  वही उम्मीद  हुव है, जो कि एक माता- पिता न अपरी सन्तान सु और एक गुरु न अपरा शिष्य सु और एक सेनापति न अपरी सेना सु होव है।
समाज र  वातावरण म पलने वालो नन्हो बालक  (देश के भविष्य )न सुरु से ही शिक्षा दी जावे जद ही वो बढ़ो होर एक अच्छा नागरिक बन , समाज रूपी वटबृक्ष को संरक्षण कर , फलने फूलने म सहभागी बन शक है।नारी सु भी एक नारी रो उत्थान में महत्वपूर्ण उत्तरदायित्व हुव है।
अन्तत: इतना ही कहना चाहूं चंद शब्द री लिखने में समाज आपाऊ वो सारी उम्मीद रख जो आपा अपना परिवार सु रखा हा । हमेशा मायड़ भाषा रो उपयोग करा , सामने वालों शुरुआत नहीं करें, तो आप आ ही पहल कर अपनी भाषा न निरंतर आगे बढ़ाने रो प्रयास करा।
                                                मनीषा मारू
        

“सुहानी हवा”

ऐ लहराती हुई -सुहानी हवा,
तू ही कुछ बता।
क्या राज है तुझमे छुपा,
सुबह-सुबह उठकर
आ जाती हूं छत में सदा।
एक दिन भी
ऐसा गुजरता नहीं,
की ना लू में
कोयल की कूह कूह
चहेकती चिड़िया की गूंज
और  पेड़ – पौधों की
सरसराहट का मज़ा।
छूकर जब भी तुम मेरे
पास से होकर गुजरती हो
लगता है जैसे पा रही मैं
तब मीठी-मीठी
खुशियों  भरे एहसासों की सजा।
ऐ मेरी लहराती सुहानी हवा
अब तू ही कुछ बता…क्या राज हैं तुझमें छुपा।

मनीषा मारू
नेपाल

कुछ करके निखर जाऊं।

घुटन से रो रो के मर जाऊं, या कुछ करने कि ठान जिंदगी में आगे बढ़ जाऊं।

जीवन में सबके आती है मुश्किलें, तो मै भी क्यों ना कुछ करके निखर जाऊं।

बाधा बन जाते हैं जीवन मैं जो लोग, क्यों ना उन्हें भी कुछ करके दिखाऊं।

किसी के लिए क्यों रात दिन मैं अब आंसु बहाऊ, जब उन्हें मेरी कद्र ही नहीं।

हर परिस्थितियों को चुनौतियों बना, क्यों ना मै अब खुद को चमकाऊ।

घुटन से रो रो के मर जाऊं, या कुछ  करने कि ठान जिंदगी में आगे बढ़ जाऊं।

               खुशहाली

बहुत सारी बातें, जो जीवन में खुशहाली लाती।

आनंद, उत्साह हृदय के अन्दर है फिर बढाती।

जैसे कोई नया कवर मै अपने जीवन में हूं चढ़ाती।

दिल की धड़कन भी है फिर हलचल मचाती ।

मत पूछ कैसे बताऊं तुम्हें मेरे साथी।

जीवन अधूरा लगता है , तुम्हारे बिन जैसे दिया बिना बाती।

कुछ तो लगा मन को

कुछ तो लगा मन को

तभी टूटने लगा

एक कोने से रोने लगा

आंसू ना दिखा सकू

क्या हुआ किसी को

बता ना सकू

छुपाऊं तो घुटन में जीऊ

और अंतर्मन का टूटने से

खुद को भी ना बचा सकूं

ध्वजा तो मंदिर में लहराती है सदा।

हवाओं ने रुख बदली, सितारों ने चाल बदली।

मगर ध्रुव तो अटल रहता हैं अंबर पे सदा।

समुंद्र ने किनारे बदले, तूफानों ने लहरें बदली।

मगर जल तो जीवन- प्राण रहता हैं सदा।

पतझड़ ने मौसम को बदला ,नकाब ने चेहरों को बदला।

मगर बहारों में फूल खिलते हैं सदा।

धुन ने संगीत को बदला, ताल ने नृत्य को बदला।

मगर राग तो साज करती हैं अधरों पे सदा।

भावनाओं ने विश्वास को बदला, लोभ ने इंसान को बदला।

मगर हृदय नैन तो कराते है आत्म- दर्पण सदा।

हादसों ने जीवन को बदला, अखबारों ने खबरों को बदला।

मगर मुश्किलों में हौसला ही काम आता हैं सदा।

समय ने सूत्रों को बदला, दर्पण ने सौंदर्य को बदला

मगर धरा के श्रृंगार से ही मानव सजता है सदा।

शंखनाद की गूंज बदली, घंटियों की ध्वनि बदली।

मगर ध्वजा तो मंदिरों पे लहराती है सदा।

मनीषा मारू

अपेक्षाओं के दुःख घनेरे

मत करो किसी से अपेक्षा

आगे बढ़ते चले जाओ अकेले ही।

खुद ही कर्मठ बनो,

हौसला ना हरो हारकर भी।

उतार चढाव हैं जिंदगी,

रात अंधेरी तो फिर होगा सुनहरा सबेरा भी।

अडिग रहो अपने पथ पर

तो निश्चित पा ही लोगे अपना लक्षय भी।