जीवन में जब ,बेटी यौवन की दहलीज पर खड़ी होती है, तो उसकी पहली दोस्त उसकी मां होती है। मां से अटूट प्यार वाला रिश्ता तो होता ही है, साथ ही दुनिया की वो सबसे पहली और अच्छी दोस्त होती है, जो परछाई जैसे सदा हमारे साथ रहती है। वह हमारी सखा,साथी, आलोचक सब कुछ होती है। जब भी हम टेंशन में या विपरीत परिस्थिति में होते हैं ,तो मां उन खुली खिड़कियों की तरह होती है, जो जीवन में फिर से ताजी हवा हमारे भीतर भर एक नया मार्ग दिखाती है। मां ही पहला प्यार और दोस्ती कहलाती है।
महीना: जुलाई 2020
दिमाग रूपी कोरॉना कब जाएगा?

कोरॉना क़ाल बन गया जी का जंजाल।
उथल-पुथल हो गई, 4 महीनों से जिंदगी।
हर सिक्के के दो पहलू होते हैं—
कोरॉना ने भी यही सीखाया।
कितने हो गए घर से बेघर,
कितनों ने भूखे पेट जान गवाई।
कितनों की विरह वेदना से,
हृदय नैन हुआ घायल,पर
हम देख कर भी कुछ ना कर पाए।
पुलिस, प्रहरी, नर्स ,डॉक्टर,
सबका जीवन हैं परवान चढ़ा।
पर इनके लिए,
किसी का ना हाथ आगे बढ़ा।
महाभारत, रामायण सब ने फिर से देखा,
हाथ जोड़ना सीख मृत संस्कार भी जिंदे हुए।
2 गज की दूरी बढ़ी,
हाथों पर सेनीटाइजर बार-बार लगा,
मुंह पर बंद गई सबकी पट्टी।
लेकिन जिनके दिमाग में ही बैठ गया कोरॉना,
वह कब जाएगा ,
जिन्होंने आपनो से बना ली मन में दूरियां,
और बांध ली आंखों पर पट्टी।
इसका मलाल ही जीवन भर रह जाएगा।
🙏 मनीषा मारु 🙏
" नारी की पुकार"
मन में विश्वास है
हे नारी तू महान है
मां, बहन, बेटी,
पत्नी के रूप में हो तुम सजती ।
तो देवी बन मां सरस्वती ,लक्ष्मी ,
दुर्गा और काली के रूप में ,
सर्वत्र पुजी जाती ।
हे नारी तू महान है….
बेटी बन मां-बाप का मान रखती,
तो बहु बन सास – ससुर का सम्मान करती ।
मां बन बच्चों को शिक्षा देती ,
तो पत्नी बन सुख – दुःख की सहभागीनी बनती ।
हे नारी तू महान है..
घर का कर्तव्य निभा कर भी,
तुम चुप हो रहती।
तो बच्चों की किलकारी से,
तुम हरपल खुश रहती ।
घर -परिवार की डांट ,
भी तू हंस कर सह लेती।
तो अपने परिवार की खुशी के लिए
अपने सारे सपनों को कुर्बान करती।
तूफानों से टकराकर ,
सबपे हो तुम प्यार लुटाती।
है नारी इसलिए तू महान कहलाती।
शेष कुछ बचा नहीं
गुरुजनों को समर्पित
गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु र्गुरुर्देवो महेश्वरः
गुरु साक्षात परब्रह्मा तस्मै श्रीगुरवे नमः
माटी रख कर चाक पर, घड़ा घड़े कुम्हार!
श्रेष्ठ गुरु मिल जाय तो, शिष्य पाय संस्कार!!
धरती कहती, अंबर कहता ,कहता है जन -जन
का यह विचार।
गुरु बिन मिलता नहीं,
हमारे विचारों को नव आकार।
गुरु की डांट में भी ,छुपा होता है प्यार ।
वो ही तो भरते हमारे अंदर ,ज्ञान का भंडार।
जैसे शिल्पकार ,छेनी से गढ़ता
पत्थर पर मनचाहा आकार।
वैसे ही गुरु आत्मविश्वास जगा कर,
करवाते हमसे ,हमारे ही सपनों को साकार।
सभी छोटे-बड़े ,भाई- बंधु ,सखा- मित्र,
और चित -परिचित को है मेरा नमन
सभी से मिलता हामें ,कुछ न कुछ जीवन में ज्ञान
बच्चो के प्यार आगे,
भी नतमस्तक हो जाती हूं मैं कई बार।
डांट रोष खाकर पर भी, लुटाते अपना स्नेह- दुलार।
लेकिन सर्वप्रथम कर जोड़ करती हूं ,
मेरे प्रथम गुरूमाता-पिता को प्रणाम।
क्योंकि उनसे ही मिला हैं,मुझे ये जीवन- प्राण
धन्यवाद्
मनीषा मारू
