
एक अवसर मिला की अवसर पर कुछ लिख जाऊं
कुछ शब्दों में ही सब कुछ कह जाऊं,
खुद भी मुस्कुराह लू और जो बैठे है
भर के नैनो में गमों की नमी उनको भी यहीं समझाजाऊं।
चार दिनों की जो मिली हैं जो जिंदगी
विपरीत परिस्थितियों में भी इसें स्वीकार करती जाऊं।
हर बार दामन में खुशियों की सौगातें मिलें ये जरूरी नहीं,
कांटों के बीच खुद को गुलाब सा खिलाऊं,
और ओरो को भी इसी चुभन के साथ
खिलने को तत्पर करजाऊं।
सुख दुःख का समावेश होती है जिंदगी,
ना सुख में इतराऊं ना दुःख में घबराऊं,
बस जिंदगी के हर लम्हें को जिंदादिली से जीती चली जाऊं।
खुद को यही समझाऊं ओरो को भी यही बतलाती जाऊं।
©®मनीषा मारू
नेपाल
