दिल#मां

दिल के दरवाजे मैं
सबसे पहली दस्तक
होती हैं मां के प्यार की।

धड़कन बनते ही,
जो धड़कती हैं नन्ही सी जान,
9 महीने हर रिश्तों से ज्यादा
करती है केवल,
एक मां ही उसको प्यार।

उम्मीदों की ऊंची मीनारें,
और खुशियों के ताजमहल
भी हम खड़े कर सकते हैं।
लेकिन मां के प्यार का कर्ज
हम कभी अदा नहीं कर सकते।

अर्श से फर्श तक
हर ख्वाहिशों के ख्वाब को,
शायद कोई पूरा कर दें।
लेकिन मां के प्यार की कमी
कोई भी,कभी भी पूरी नहीं कर सकता।

इतना असीम प्यार करके भी,
हर मां का दिल गम से भर जाता हैं
क्योंकि वो अपने बच्चों की तकदीर
नही लिख पाती।
इसलिए बच्चों के हर दर्द में
मां की पलके दिल की गलियों में
सबसे पहले हैं भीग जाती।

मनीषा मारू
नेपाल

🌹नई 🌹शुरुवात 🌹

यादों के झरोखे खुलते ही
अंतरमन कर बैठा द्वंद।
कभी तो अकेले में तू,
पहले जैसे खुल के हंस।

यू रूखी रूखी अंजान सी,
बन गई हे क्यों ?
खुद के लिए एक मेहमान सी।

छोड़ उम्र की फिक्र,
खोल शरारतों  का ढक्कन,
जोड़लें बच्चों संग,
मस्तियों की लड़ियां
जुड़ने लगेगी फिर से
दिल से दिल की कड़ियां।

देख लौटकर आजाएगा ,
फिर से तेरा वो बचपन।
केवल खुद के लिए ही नहीं ,
औरों के लिए भी तू
मुस्कुराने की वजह बन।

बिखड़े गमों के ईटों पर,
एक बार प्यार का रंग
फिर से तू तो चढ़ा।
खुशियां इतनी मिलेगी ,
कि तू भूल जाएगी सारा टेंशन।

उस वक्त से ही,
जहन के विरासत में,
बैठ गई मेरे ये बात,
अंतर्मन यू कहने लगा,
कभी तो कही से करनी ही होगी …
क्यों ना आज से ही करलो तुम
खुद को खुश रखने की नई शुरुआत ,
खुद को खुश रखने की नई शुरुआत ।

मनीषा मारू
नेपाल

बस तुम देखते जाओ…

जिंदगी में आगे बढ़ना है तो
बहरे बन जाओ।
सितारे ना सही अपने जीवन,
के तारे ही बन जाओ।

अपने स्वाभिमान को रख के जिंदा,
काम  तुम कुछ ऐसा कर जाओ।
छोटी-छोटी गलतियों से सीख लो,
हार के भी कोशिश करो कि
तुम बुलंदियों को छू जाओ।

मत रखो ओरो से उम्मीद,
खुद को करो बुलंद इतना
कि अपनी ख्वाहिशों को,
अपनी ही लगन मेहनत से तुम पा जाओ।

रात ही तो अक्सर,
चमकते तारों का जाल बुनती है।
जब अंधकार छा जाए
जीवन में तुम्हारे
उस वक्त तुम ना घबराओ
यूं समझ लेना चमकने वाले हैं
तुम्हारे भी जीवन के सितारे।
बस जी तोड़ मेहनत
अपने सपनों के लिए करते जाओ।

भीड़ में शामिल होकर भी ,
सबसे अलग दिख जाओ।
खुद ही खुद को तराशते जाओ
और अपने जीवन के हरपलों को
कुछ इस तरह से जी जाओ।

सबको खुश रखना
हमारे बस का नहीं,
इसलिए भगवान नही,
केवल सच्चे इंसान बन जाओ।

कठिन परिस्थितियां देगी तुम्हें चुनौती,
हर चुनौतियों को तुम स्वीकार करते जाओ।
रास्ते आसान  और मंजिल पास हो जाएगी
बस तुम देखते जाओ..बस तुम देखते जाओ।

मनीषा मारू
नेपाल

रेत

मन की रेत पर,
अक्सर हौसलो के टिले बनाए।
कई बार कोशिश की,
आंसुओं  के सेलाबों से वो ढह ना जाए।

बड़े प्यार से हर रिश्ते जब हमें आजमाए,
कोई दूर रहकर भी,
दुआओं से,
अपनापन का किरदार निभाए।
तो कोई पास रहकर भी,
बोली से तीर चुभाए।

फर्ज़ के आगे
अब तो केवल रिश्ते झुकते जाए।
स्नेह के नाम पर तो बस
रेत की तरह हाथों से फिसलते जाए।

फिर कैसे ?
हर रिश्ते को प्रेम से बचाया जाए।
जब तक हर रिश्तों में,
विश्वास का बीज ना बोया जाए।
कितने भी बनाले,
हम मजबूत रेतों के महल,
दिखावें की लहरों में,
सब एक न एक दिन बह ही जाए।

मनीषा मारू
नेपाल

मां पूरी दुनियां में, तेरे हाथों वाली बात कहां।

मां पूरी दुनियां में तेरे हाथों वाली बात कहां,
सबके लिए बनाती मैं मनपसंद,
लेकिन मेरा मन तो ललचता,
सिर्फ तेरे बनाए पकवान पर।
काश की कोई ऐसा जादू हो जाए
छड़ी घूमते ही,
तेरे हाथों वाला स्वाद आ जाए।
मैं जानती हूं,
ऐसा कुछ हो सकता नही।
तेरे हाथों जैसा स्वाद,
कभी भी कही भी आ सकता नहीं।
चाहे तू बनाए मेवे मिष्ठान,
चाहे होली दिवाली भरे पकवानों के भंडार,
चाहे बनाओ रोटी सब्जी,
चाहें रंधो तुम दाल और भात,
बरसती सबमें तेरे हाथों की अमृत रस धार,
पेट भले भर जाए मां एकबार,
लेकिन कभी तृप्त न होती
मन की मीठी धार।
मां मेरे लिए तो ,
तेरे हाथ का खाना ही है ,
सारे स्वादिष्ट खानों का जहा।
मां पूरी दुनियां में तेरे हाथों वाली बात कहां।

मनीषा मारू
नेपाल

अब शेष कुछ बचा नही…

अब शेष कुछ बचा नहीं,

सब कुछ है, बिखर गया जाने क्यों?

कबूल होती कुछ दुआ नहीं,

ऐसा हमने क्या अनर्थ कर दिया।

इंसानों से ही तो होती है गलतियां,

सामझाने का एक भी मौका ना मिले तो ,

खत्म हो जाती है एक ही पल में सारी अच्छाइयां,

आंखों देखा हाल सुनाते सब,

नहीं मापते अंदर की गहराइयां ।

अंदर के बिखरे सैलाब को

किसी ने आजतक देखा नहीं,

तो कैसे जानेगा !

कोई दर्द कितना हुआ था ।

जब टूट रही थी किसी ने गले लगाया नहीं ,

टूटा हुआ दिल कहता है

अबशेष कुछ बचा नहीं ।

मनीषा मारू
नेपाल

मां तुमसा धैर्य कहां रख पाते हैं।

मां तुमसा धैर्य कहां रख पाते हैं।
जरा सी परेशानी आई नहीं कि
उदास हताश हम हो जाते हैं।
मां तुमसा धैर्य कहां रख पाते हैं।

मां तुम तो केवल तुम ही हो,
हर मुश्किलों का सामना कर
बड़े नाजो से पाला हमको.
जब बारी आई हमारी ,
बच्चों को पालने की,
तुमसा धीरज नहीं धारा जाता मां
बेबाक ही झल्ला उठते हैं,
मां तुमसा धैर्य कहां रख पाते हैं।

बड़ी से बड़ी तकलीफ में भी,
अकेले ही दर्द उठा लेती
और चेहरे पर अपने
एक शिकन ना आने देती।
लेकिन हम तो मां
छोटी-छोटी कोशिशों में भी हार जाते हैं।
मां तुमसा धैर्य कहां रख पाते हैं।

लेकिन यह भी कड़वा सच है मां
बस तुम्हारी ही बातें
तुम्हारी ही छवि सोच ,
दिनभर में एक बार
जरूर चार्ज हम हो जाते हैं।
मांतुमसा धैर्य हम कहां रख पाते हैं।

मनीषा मारू
नेपाल

यात्रा

यात्रा शुरू होती है
मां के गर्भ से होकर
प्रकृति की गोद तक।

मां में ही सारा जहां दिखता
और उसके आंचल की छांव में
ही अठखेलियां करते
बड़े होते रहते हैं हम।

प्यारा सा होता है बचपन
ना किसी का डर ,
ना किसी की फिक्र,
बस मस्तमौला ही
घूमते रहते हैं हम।।

जवानी की दहलीज में
रखते ही कदम,
हर दुःख को छुपाना सीख जाते हैं
चाहे कितनी भी हो आंखें नम।

आते ही बुढ़ापा,
फिर से लौट आता है बचपन
और अंततः प्रकृति की गोद में
समा जाते हैं हम।

मनीषा मारू
नेपाल