आज बैठी छत की मुंडेर पर,
देखा आसमा की ओर,
जनता है वह अपनी विशालता,
फिर भी जाने क्यों ?
बूंद बूंद अपने जज्बातों को.. छलका रहा मेरी ओर।
जब पूछा मैंने …
उसके छलकते हुए आंसुओं का राज,
तो वो बैचेन हो, व्याकुलता से जैसे मुझे बता रहा हो,
सब छू लेना चाहते हैं मुझको,
लेकिन रिक्तता को मेरी,
कोई नहीं इस जगत में समझ पा रहा!
मैं आसमा होकर भी… सदा धरा से वंचित रहा,
कभी बूंद बूंद ,कभी रिमझिम रिमझिम कर,
तो कभी घनघोर बरस कर…
अपने खालीपन के हर गमों को
वसुंधरा से बस यूं ही बता रहा।
कोई ना हैं यहां पूर्ण
बस यही बात बेजुबा होकर भी,
मैं सबको इशारे से समझा रहा..
मैं सबको इशारे से समझा रहा।
©®मनीषा मारू
नेपाल





