आसमान

आज बैठी छत की मुंडेर पर,
देखा आसमा की ओर,
जनता है वह अपनी विशालता,
फिर भी जाने क्यों ?
बूंद बूंद अपने जज्बातों को.. छलका रहा मेरी ओर।

जब पूछा मैंने …
उसके छलकते हुए आंसुओं का राज,
तो वो बैचेन हो, व्याकुलता से जैसे मुझे बता रहा हो,
सब छू लेना चाहते हैं मुझको,
लेकिन रिक्तता को मेरी,
कोई नहीं इस जगत में समझ पा रहा!

मैं आसमा होकर भी… सदा धरा से वंचित रहा,
कभी बूंद बूंद ,कभी रिमझिम रिमझिम कर,
तो कभी घनघोर बरस कर…
अपने खालीपन के हर गमों को
वसुंधरा से बस यूं ही बता रहा।

कोई ना हैं यहां पूर्ण
बस यही बात बेजुबा होकर भी,
मैं सबको इशारे से समझा रहा..
मैं सबको इशारे से समझा रहा।

©®मनीषा मारू
           नेपाल

ना तलवार की धार से, ना गोलियों की बौछार से.. बंदा डरता है तो सिर्फ परवर दिगार से.

#फिल्म #तिरंगा ब्रिगेडियर सूर्यदेव सिंह,(1992)

इंसान हूं, फिर इंसानों से कैसा डरना?
नेकी की राह हे अगर पकड़ी
तो पड़ेगा अकेले ही चलना।

ना हालातों से डरना ना,अंधेरों से घबराना।
उम्मीदों से टूट कर भी,
नित्य नई आशा की ज्योत है जलाना।
फिर हर डगर महसूस होते दिखेगा तुझे,
संग तेरे खुदा का मुस्कुराना।

फक्र होता हे देख सदा,तिरंगे का लहराना
चाहें हो वो एक देश सिपाही
या हो एकदेश प्रेम दीवाना।
आन बान और शान पे इसकी
बस आता हे उसको तो निडर होकर मर मिटजाना।

जितनी सांसे उतना ही है सबका जीना,
सच्चे कर्म पर हो अगर विश्वास अटल
तो नही पड़ेगा किसी के आगे गिरना
झुकना पड़े तो बंदे
बस एक खुदा के आगे ही तुम झुकना।

और डरना पड़े तो ना तलवार की धार से, ना गोलियों की बौछार से.. डरना सिर्फ अपने परवर दिगार से।

©®मनीषा मारू
           नेपाल