अवसर

एक अवसर मिला की अवसर पर कुछ लिख जाऊं
कुछ शब्दों में ही सब कुछ कह जाऊं,

खुद भी मुस्कुराह लू और जो बैठे है
भर के नैनो में गमों की नमी उनको भी यहीं समझाजाऊं।

चार दिनों की जो मिली हैं जो जिंदगी
विपरीत परिस्थितियों में भी इसें स्वीकार करती जाऊं।

हर बार दामन में खुशियों की सौगातें मिलें ये जरूरी नहीं,
कांटों के बीच खुद को गुलाब सा खिलाऊं,
और ओरो को भी इसी चुभन के साथ
खिलने को तत्पर करजाऊं।

सुख दुःख का समावेश होती है जिंदगी,
ना सुख में इतराऊं ना दुःख में घबराऊं,
बस जिंदगी के हर लम्हें को जिंदादिली से जीती चली जाऊं।
खुद को यही समझाऊं ओरो को भी यही बतलाती जाऊं।

©®मनीषा मारू
नेपाल

आदर्शलोक

स्वर्ग यहां नर्क यहां
क्या देखा है ?
किसी ने आंखों से सारा जहां।
फिर फर्क करना कैसे  सबको आ गया!

सोचते सभी स्वर्ग के द्वार जाने को,
लेकिन स्वार्थी जीव वंचित ना रह पाता,
छलनी करने से किसी की आत्मा को।

जब ला दो किसी के,
उजड़ी उम्मीदों की आंखों में खुशियों की नमी।

जब दे दो तुम बहाकर अविरल धारा सी ,
सींच प्रकृति को नेह प्रेम कि बलि।

और तृप्त करदों किसी के बिलबिलाते
भूखे पेट की अंतरआत्मा को,

तो समझ लेना आदर्शलोक का स्वर्ग
इस धरा पर भी पलता है ,
किसी न किसी इंसानों के बीच यही  कहीं।

©®मनीषा मारू
          नेपाल