#Moneyplant

गमले और बोतलों में लगा
   मनीप्लांट का पौधा मुझे भीतर
   ही भीतर कचोट रहा।
 
  जब भी बेल बढ़ती मेरी
  हर कोई चोरी छिपे उसे तोड़ रहा।

  जाने कैसी शत्रुता है सबकी मुझसे
  मैं आज तक समझ ना पाई,
  बस उलझनों के धागों सा
  चारों ओर मन मेरा हे टूट कर बिखर रहा।

   पहले मुझे मेरे अस्तित्व से हे मिटाते,
   फिर मेरे वजूद को कभी गमले में,
   तो कभी बोतलों में लगा
   हर कोई अपना घर हे सजा रहा।

  मेरी बेल की हर एक गांठ से
  रिसता हुआ दर्द का आंसू ,
  अपने रूदन से मेरे अंतर्मन को
  अब तो तड़पा के भिगो रहा।

©®मनीषा मारू
           नेपाल