अंतर्मन का दीप

चहु और मेरा ही अक्स,
तो है  मेरे संग घूम रहा ।
और अंतर्मन में उम्मीदों का
एक छोटा सा दीप प्रज्वलित कर रहा।

इस प्रज्वलित दीप की
रोशनी चारों ओर यू बिखर रही।
जैसी डूबते को कोई
तिनके का सहारा हैं लगा रहा।

इतना आसान नहीं है,
बिन ठोकर खाए आगे बढ़ जाना।
तू कोशिश कर बार बार गिर के उठने की,
देख तेरा रब भी तेरी अंगुलियों को पकड़
हरबार सहारा दे उठा रहा।

जब तक तेरा हौसला तेरे पास है,
दे सकता नही कोई तुझे मात है।
ऊपर वाला भी देगा तेरा साथ है,
बस इसी विश्वास के दीप
को करके हरदम प्रज्वलित
तू देख एक उम्मीद का आसरा
फिर से तेरे अंतर्मन को है झंकार रहा।

मनीषा मारू
नेपाल