
मां पूरी दुनियां में तेरे हाथों वाली बात कहां,
सबके लिए बनाती मैं मनपसंद,
लेकिन मेरा मन तो ललचता,
सिर्फ तेरे बनाए पकवान पर।
काश की कोई ऐसा जादू हो जाए
छड़ी घूमते ही,
तेरे हाथों वाला स्वाद आ जाए।
मैं जानती हूं,
ऐसा कुछ हो सकता नही।
तेरे हाथों जैसा स्वाद,
कभी भी कही भी आ सकता नहीं।
चाहे तू बनाए मेवे मिष्ठान,
चाहे होली दिवाली भरे पकवानों के भंडार,
चाहे बनाओ रोटी सब्जी,
चाहें रंधो तुम दाल और भात,
बरसती सबमें तेरे हाथों की अमृत रस धार,
पेट भले भर जाए मां एकबार,
लेकिन कभी तृप्त न होती
मन की मीठी धार।
मां मेरे लिए तो ,
तेरे हाथ का खाना ही है ,
सारे स्वादिष्ट खानों का जहा।
मां पूरी दुनियां में तेरे हाथों वाली बात कहां।
मनीषा मारू
नेपाल
