
यादों के झरोखे खुलते ही
अंतरमन कर बैठा द्वंद।
कभी तो अकेले में तू,
पहले जैसे खुल के हंस।
यू रूखी रूखी अंजान सी,
बन गई हे क्यों ?
खुद के लिए एक मेहमान सी।
छोड़ उम्र की फिक्र,
खोल शरारतों का ढक्कन,
जोड़लें बच्चों संग,
मस्तियों की लड़ियां
जुड़ने लगेगी फिर से
दिल से दिल की कड़ियां।
देख लौटकर आजाएगा ,
फिर से तेरा वो बचपन।
केवल खुद के लिए ही नहीं ,
औरों के लिए भी तू
मुस्कुराने की वजह बन।
बिखड़े गमों के ईटों पर,
एक बार प्यार का रंग
फिर से तू तो चढ़ा।
खुशियां इतनी मिलेगी ,
कि तू भूल जाएगी सारा टेंशन।
उस वक्त से ही,
जहन के विरासत में,
बैठ गई मेरे ये बात,
अंतर्मन यू कहने लगा,
कभी तो कही से करनी ही होगी …
क्यों ना आज से ही करलो तुम
खुद को खुश रखने की नई शुरुआत ,
खुद को खुश रखने की नई शुरुआत ।
मनीषा मारू
नेपाल
