❤️”मां”❤️

“मां”❤️ के बिना हर कहानी अधूरी।
हरहाल में करती वो, तो अपने बच्चों की इच्छा पूरी।
एक बार जे झिरक देती “मां”❤️ अगर,
फिर बार बार ह्रदय से लगा
करती पल पल स्नेह आलिंकन।
“मां”❤️ शब्द तो होता अपने आप में ही पावन।
उसके बिना लगता हरपल सुना सावन।
हर “मां”❤️ को अपने बच्चे लगते जिगर के टुकड़े,
गोरे हो या काले,सुधरे हो या बिगड़े,
ले ले बलैया “मां”❤️ तो बस हरपल नजर उतारे।
“मां”❤️ के नाम पे कई लेखनी का लेख है गढ़ता,
उनके आगे तो देवताओं का सर भी जाता हे झुकता।
मेरी लेखनी भी जब झुक– झुक कर लिखती है “मां”❤️ का नाम,
यूं लगता है उस वक्त मुझको, जैसे हो गए हो मेरे चारोधाम।🙏❤️🙏

सुनहरा भोर

अंधकार से तूफान जब घिरा हो चारों ओर,
दिखाई देती है अगर प्रकाश की एक सूक्ष्म डोर,
देखकर उस डोर को,
अपने हौसले को कर फिर से जीवांत
और जगा ले अंतर्मन में एक नई विश्वास की भोर।

आया है जो भुखमरी ,लाचारी, बेबसी का दौर,
कुछ ना सही, फरियाद तो कर सकते हैं रब से,
हम एक दूजे के लिए दोनों कर को जोड़।

इस संकट की काली घटा को दूर हटाओ ,
प्रार्थना हमारी स्वीकार करो,
घर से हुए है जो बेघर ,
दे दो उनको कोई तो ठोर,
अब तो सुन करुण पुकार हमारी,
कर दो अंधेरी रात का हैं ईश्वर, सुनहरा सा भोर।

मनीषा मारू
नेपाल

अंतर्मन का दीप

चहु और मेरा ही अक्स,
तो है  मेरे संग घूम रहा ।
और अंतर्मन में उम्मीदों का
एक छोटा सा दीप प्रज्वलित कर रहा।

इस प्रज्वलित दीप की
रोशनी चारों ओर यू बिखर रही।
जैसी डूबते को कोई
तिनके का सहारा हैं लगा रहा।

इतना आसान नहीं है,
बिन ठोकर खाए आगे बढ़ जाना।
तू कोशिश कर बार बार गिर के उठने की,
देख तेरा रब भी तेरी अंगुलियों को पकड़
हरबार सहारा दे उठा रहा।

जब तक तेरा हौसला तेरे पास है,
दे सकता नही कोई तुझे मात है।
ऊपर वाला भी देगा तेरा साथ है,
बस इसी विश्वास के दीप
को करके हरदम प्रज्वलित
तू देख एक उम्मीद का आसरा
फिर से तेरे अंतर्मन को है झंकार रहा।

मनीषा मारू
नेपाल

पूल

दो दिलों के बीच ना बांधो पूल।
एक दूसरे को बतला लो,
हो जाए अगर किसी प्रिय से कोई भूल।

गलत फैमिलीयों को गलती से न दो बढ़ावा ,
रुखसत कर दो स्नेह प्रेम से सींच उन्हें,
खिलालो फिर से मन आंगन के मुरझाए फूल।

सांसो के तनो बानो का ठोड़ ठिकाना नहीं,
झूठी जिद्द में अडिग हो ढूंढो कोई बहाना नहीं।

गुस्ताखियां तो सबसे होती है।
और बढ़ती है जो दूरियां अहम,वहम से,
साफ करते जाओ इन्हें भी….

जैसे आईना साफ करते ही
हट जाती है चेहरे के आगे की धूल

ना बांधो दो दिलों के बीच में पुल।

मनीषा मारू
नेपाल

खूबसूरती

खूबसूरती कभी शब्दों की भाषा में,
हो सकती परिभाषित नहीं।
ये तो नजरों को छू,
रूह में बस जाती है कहीं ना कहीं।

कीचड़ में खिलने वाला कमल,
भला होता किसी को पसंद नहीं।

अपनी खूबसूरती की वजह खुद बनो,
चाहे हो किसी को स्वीकार नहीं!

सूरज ,चांद ना बन सको ना सही,
लेकिन अपने जीवन के,
टिमटिमाते सितारे बन ,
किसी का उदाहरण बन
सकते हो कहीं ना कहीं।

सागर के भीतर भी,
एक खूबसूरत सा संसार बसता है कहीं ।
लेकिन जो तूफानी लहरों को,
काट पार कर गया,
भीतर का सौंदर्य भरा
संसार देखता केवल वही।

प्रकृति की छटा रहती हरवक्त निराली ,
चाहे रौंदले उसको कितना भी कोई
क्योंकि खूबसूरती होती
किसी की मोहताज नहीं।

मनीषा मारू
नेपाल

काजल

काजल जब कजरा बन जाए,
सबकी नजरों को रंगीन ,मदहोश कर जाए।

वही काजल जब तन का रंग बन जाए,
तब उसकी अवहेलना कर,
हर बार ही कोशा जाए।

बचपन ,जवानी हो या बुढ़ापे का आजाना
हर उम्र में उड़ता मजाक,
और सुनने को मिलता ताना।

मांए तो ,
जन्म से ही श्वेत ,श्यामल दोनों रंग पे
पल पल वारी जाए।
कभी वो नजर उतारे,
तो कभी देख निहार,
अपने जिगर के टुकड़े को खुश हो जाए।

बात आए जब जवानी की,
और किसी  पे दिल आ जाए।
अपने प्रेमी प्रेमिका के श्यामल रंग के आगे,
उन्हें जन्नत के हूर भी ना  सुहाये।

आए बात जब बुढ़ापे की,
तो श्वेत ,धवल की तृष्णा ही मिट जाए,
अंतिम सांसों तक एक दूजे  के रूह में समा
अटूट प्रेम का इत्र ही केवल नैनों से छिड़का जाए ।

काजल की बिसात बस इतनी सी,
दो बंद कोठियों के बीच ही अपना शहर बसाए,
बाहर निकल न किसी  की अश्रु धार बन बह जाए,
ना ही किसी के गालों में लिपट पसरा जाए।

गोरी होकर राधा भी श्याम के रंग में ही रंग जाए,
रात काले अंबर पे ही तो ,
झिलमिल तारों की मधुर छाटा बिखरी जाए।

श्वेत कागज पर जब लेखनी का काला जादू चढ़ जाए,
तो मन के हर भाव मोती बनकर निखरे जाए।
क्यों काला रंग कई बार अशुभ मनाजाए?
जबकि जीवन में स्कूल की शुरुआत
पाठशाला के ब्लैक बोर्ड से की जाए।

मनीषा मारू
नेपाल










आंसू

जब अपना कोई रूठ जाए,
नन्हा सा दिल टूट जाए,
हृदय ये अघात सह न पाए,
नैनो से फिर गंगा जमुना कल कल बह जाए।

खामोशियां खामोशी से सारा वृतांत सुना जाए।
पहले कौन कदम आगे बढ़ाए,
इस जिद्दी सोच में जब सब अड़ जाए,
अपना है कौन यहां?
यह सोच मजबूत विश्वास
की जड़ों को भी तब हिला जाए।

फिर घुट घुट के आंसुओं के पैमाने ,
आंखों से छलक जाए…
और इसी बहाने से ही सही…
अश्रु …गालों की गलियों से होकर,
खामोशी से लबों को,
किसी अपने के नाम से छू जाए।

फिर से अपनेपन के यादों की चाशनी में,
ये टूटा दिल रह रह कर डूबा जाए,
घायल अंतर मन के आंसुओं को,
तब रोकना मुश्किल ही नहीं ,
नामुमकिन भी हो जाए।

मनीषा मारू
नेपाल